झूठन ओमप्रकाश वाल्मीकि की आत्मकथा है, जो भारत में जाति आधारित भेदभाव और सामाजिक अन्याय की सच्ची और मार्मिक कहानी बताती है। लेखक ने अपने बचपन से लेकर नौकरी तक के जीवन का वर्णन किया है — जहाँ उन्हें दलित होने के कारण समाज में अपमान और कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।
यह पुस्तक न केवल एक व्यक्ति की आत्मकथा है बल्कि भारत के समाज का दर्पण भी है। इसमें बताया गया है कि कैसे “झूठन” यानी बचा हुआ भोजन, जो सवर्णों के लिए तुच्छ था, दलितों के लिए जीवन का हिस्सा बन गया।