“कितना सच कितना झूठ” एक विचारोत्तेजक और यथार्थपरक पुस्तक है जो जीवन, समाज और इंसान की सच्चाइयों व भ्रमों के बीच फर्क को उजागर करती है।
यह पुस्तक हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि हम जो देखते और मानते हैं, क्या वह सच है या झूठ का रूप? लेखक ने इसमें जीवन की परिस्थितियों, समाज की व्यवस्था, राजनीति, नैतिकता और रिश्तों में छिपे सच और झूठ को बेहद सरल और सटीक शब्दों में प्रस्तुत किया है।
यह किताब केवल सवाल नहीं उठाती, बल्कि पाठक को सोचने, समझने और आत्मचिंतन के लिए प्रेरित करती है।
यह पुस्तक उन लोगों के लिए है जो सच्चाई की तलाश में हैं और अपने आस-पास के झूठे आवरण को पहचानना चाहते हैं।